आशापुरा मां गुजरात। माता नो मढ। Aashapura Maa Gujarat। Mata no Madh। Travel Teacher

परममाया मां परमेश्वरी, जगत जननी मां जगदंबा, आदि शक्ति अन्नपूर्णा मां आशापूरा, आप सभी वाचको की आशा पूरी करें यही देशदेवी आशापुरा मां से प्रार्थना हैं, जय हो जगत जननी अन्नपूर्णा आशापुरा मां...
                      नमस्कार दोस्तो, कई बार हम न्युज में देखते हैं, सुनते हैं मोदीजी ने गुजरात में आशापुरा मंदिर में दर्शन कर चुनावी सभा का प्रारंभ कीया, रविंद्र जाडेजा ने आशापुरा मां का पूजन कीया! और भी कई जानी - मानी हस्तीओं के बारें में मां आशापुरा मंदिर में दर्शन करने की खबरें आप ने देखी होंगी, सुनी होंगी। दोस्तो, जब धार्मिक स्थल की बात हो तब गुजरात की धरती का सुनहरा इतिहास याद आयें बिना नही रह सकता हैं। गुजरात ना सिर्फ राजनिति, व्यापारी, उध्योग, कला के लिए मशहूर हैं बल्की साधु, संतो, पवित्र जगहो, मंदिरो, धार्मिक स्थलो और पर्यटन के लिए भी दुनिया भर में मशहूर हैं। समस्त सृष्टी के पालनहार भगवान श्री हरी विष्णु के अवतार भगवान श्री क्रिष्णा ने भी अपने जीवन का अंतिम समय बिताने के लिए और देहत्याग के लिए इसी पवित्र  भूमी को चुना था। चामुंडा मां, महाकाली मां, अंबाजी मां, बहुचर मां, नर्मदा मां, की तरह एक और... मां आदिशक्ति अन्नपूर्णा ने सभी जीवो, अपने भक्तो के रक्षण और कल्याण हेतु साधु-संतो की यह पवित्र और पूण्य भूमी पर भूज जिले में लखतर तहसील में मां आशापुरा के नाम से अपनी बैठक बनाई हैं, जहा अपने भक्तो का रक्षण और कल्याण हेतु मां आशापुरा सदैव बिराजमान हैं। 'आशापुरा' यानी हर आशा को पुरी करने वाली मां! इस पवित्र जगह को गुजराती लोग "माता नो मढ" कहते हैं यानी, माता की पवित्र जगह या स्थल।

आशापुरा मां नाम कैसे पडा। Ma Aashapura naam kaise pada
चौहान राजवंश की स्थापना के बाद में, शाकम्भरी माता को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता रहा। चौहान वंश का राज्य शाकम्भर यानि सांभर में स्थापित हुआ तब से ही चौहानों ने मां आद्याशक्ति को शाकम्भरी माता के रूप में स्‍वीकार करके शक्‍ति की पूजा-अर्चना शुरू कर दी। इसके बाद नाडोल में भी राव लक्ष्मण ने शाकम्भरी माता के रूप में ही माता की आराधना प्रारंभ की थी, जब माता के आशीर्वाद से उनकी सभी आशाएं पूर्ण होने लगीं तो उन्‍होंने माता को आशा पूरी करने वाली मां कह कर संबोधित करना प्रारंभ कर दीया, मतलब आशापुरा मां। इस तरह से माता शाकम्भरी का एक और नाम आशापुरा पडा और यमय बितवे पर चौहान वंश के लोग अपनी कुलदेवी माता शाकम्भरी को ही आशापुरा मां के नाम से पुकारने लगे, पहचान ने लगे।

आशापुरा मां मंदिर की कहानी। Ma Aashapura mandir ki kahani
कच्छ भूमी को पवित्र करने वाली मां आशापुरा की मुर्ति स्वयंभू प्रगट हुई हैं, भुज शहर से 95km दुरी पर बिराजमान मां आशापुरा की एक दंतकथा के अनुसार मारवाड प्रदेश का वैश्य, जैन बनिया देवचंद व्यापार के लिए गुजरात के कच्छ प्रदेश में यहां-वहा घुम रहा था, घुमते घुमते देवचंद इसी जगह आ पहुचा जहा हाल मां बिराजमान हैं। उस समय अश्विन मास के नौरात्र का प्रारंभ हुआ था, इसलिए देवचंद ने मां आदिशक्ति की स्थापना कर सच्चे मन से, भक्ति भाव पूर्वक मां की आराधना करने लगा। देवचंद अपने व्यापार का सारा काम-काज भूल कर मां की भक्ति में और भी डुबने लगा, सिर्फ अच्छे भाव से प्रसन्न हो जाने वाली कल्याणमयी जगदंबा देवचंद बनिये की श्रध्धा-भक्ति से प्रसन्न होकर, स्वप्न मे दर्शन दे कर, मां ने देवचंद बनीये को आदेश दीया की, 'जहा हर रोज मेरा पूजन-अर्चन करता हैं वही पर मेरा मंदिर बनवाना, लेकिन मंदिर बनवाने के बाद छह माह तक मंदिर का द्वार मत खोलना। मां के स्वप्न दर्शन वाले आदेश का पालन करने के लिए देवचंद जैन अपना वतन छोड कर यही बस कर, माता का मंदिर बनाकर, पहरेदारी करता हुआ वहा सच्चे प्रेम भाव से मंदिर के बाहर ही मां की आराधना करने लगा। लेकिन पांच महीना जितना समय बितने के बाद, एक दिन मंदिर के अंदर से झांझर और सुमधुर गित की आवाज देवचंद को सुनाई दी! सुमधुर आवाज में देवचंद माताजी के स्वप्न दर्शन वाले आदेश को भूल जाता है और मंदिर के द्वार खोल देता हैं। जैसे ही देवचंद मां की स्थापना वाली जगह देखता हैं तो उसे अलौकीक अनुभूती का अहेसास होता हैं, वहा दिव्य, जाजरमान, प्रकाशमान मंत्रमुग्ध कर देने वाली माता की मुर्ति होती हैं, परंतु वह मुर्ति आधे शरीर वाली होती हैं। छह महीने में मुर्ति का पूर्ण निर्माण होना था पर देवचंद ने एक महीना पहले ही मंदिर का द्वार खोल दीया इसी वजह से मां की मुर्ति का पूर्ण निर्माण नही हो पाया और चरणों का प्रागट्य नही हुअा। देवचंद बनिक को अपनी गलती का अहेसास होता हैं और मां के सामने अपनी गलती की क्षमा-याचना करता हैं, फिर भी मां देवचंद बनिक की भक्ति से प्रसन्न थी इसलिए देवचंद को माफ करके पुत्र रत्न का वरदान और सुखी जीवन का वरदान दीया। आज भी वहा कच्छ में मां आशापुरा की बिना चरणो वाली, घुटनो तक शरीर वाली, सात फुट ऊंची, सात नेत्रों वाली स्वयंभू दिव्य मुर्ति बिराजमान हैं, जो सदैव दर्शनार्थी का कल्याण करती हैं।
                     एक अन्य दंतकथा के अनुसार राजस्थान के एक प्रांत में राजा जाम भारमल नामक राजा को मां आशापुरा स्वप्न में दर्शन दे कर अपना राज पाट छोड कर कच्छ क्षेत्र में आने को कहा और जहा सांप और नेवला बिना लडाई के एक साथ देखने को मीले उसी जगह पर रहने को कहा। राजा जाम भारमल अपने परिवार और कबीले के साथ कच्छ क्षेत्र में आते हैं, और जहा अभी मां आशापुरा का मंदिर है उसी जगह उस समय में बसेरा करते हैं। तीन दिन बाद  मां आशापुरा जाम भारमल के सामने प्रगट होकर, दर्शन दे कर मिट्टी का धूप करने को कहती हैं, जो जाम भारमल करते हैं। मां आशापुरा जाम भारमल को सुखी जीवन के लिए आशिर्वाद देती है और कुल का रक्षण करने का वरदान भी देती हैं, तब से मां आशापुरा जाडेजा राजपूतो की कुलदेवी कहलाने हैं।

आशापुरा मंदिर का महत्व। Aashapura mandir ka mahatva
मंदिर के भीतर 7 फीट ऊंची लाल रंग की, सात आखें वाली, बिना चरणो के आधने तक शरीर वाली दिव्य और चमत्कारी आशापुरा माता की मूर्ति स्थापित है। मां आशापुरा को अन्नपूर्णा माता का अवतार माना जाता हैं, मां आशापुरा का उल्लेख पौराणिक ग्रंथो औऱ रूद्रयमल तंत्र में भी मिलता है। एक लोक मान्यता के अनुसार हिंदु धर्म के पांच पवित्र सरोवर में से एक नारायण सरोवर जाते वक्त भगवान श्री राम भी यहा इसी मंदिर मे नौ दिन तक रुके थे और मां आशापुरा का पूजन कीया था । इस मंदिर में पूजा की शुरूआत कब हुई, इसका कोई चोक्कस प्रमाण तो नहीं मिलता है लेकिन 9वीं शताब्दी ईस्वी में सिंह प्रांत के राजपूत सम्मा वंश के शासनकाल के दौरान मां आशापुरा की पूजा होती थी एसा माना जाता हैं। इसके बाद कई और समुदायों ने भी मां आशापुरा की पूजा करना शुरू कर दीया, बाद में 14वीं शताब्दी में निर्मित आशापुरा माता मंदिर जडेजा राजपूतों की प्रमुख कुलदेवी आशापुरा माता को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण जडेजा साम्राज्य के शासनकाल के दौरान किया गया था, सिर्फ भारत से नही दुनिया के हर कोने से मां मे श्रध्धा रखने वाले, साल भर श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए मंदिर में जुटते हैं! नवरात्र के दौरान इस मंदिर में खूब चहल-पहल देखने को मिलती है, खास कर अश्विन मास के नौरात्र में गुजरात भर से मुंबई और राजस्थान तक के लोग पैदल यात्रा कर के मां से आशिर्वाद में अपनी हर आशा पुरी करवाते हैं।

'माता नो मढ' क्यु कहा जाता हैं। 'Mata no Madh' kyu kaha jata hai
आशापुरा को कच्छ की कुलदेवी माना जाता है और बड़ी मात्रा में इस प्रदेश के लोगों की उनमें आस्था है। आशापुरा माता को बहुत से समुदाय अपनी कुलदेवी के रूप में मानते हैं। इनमें से मुख्‍य रूप से नवानगर, राजकोट, मोरबी, गोंडल बारिया जैसे पुराने राज्य के शासक वंश, चौहान, और जडेजा राजपूत शामिल हैं। कच्‍छ के गोसर और पोलादिया समुदाय के लोग भी आशापुरा माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं। मां आशापुरा के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है, ऐसी मान्यता है कि मां आशापुरा से जो भी मुराद मांगी जाती है, वह जरूर पूरी होती है। गुजरात में कई अन्य समुदाय भी आशापुरा देवी को अपनी कुलदेवी के तौर पर पूजते हैं। "मढ" यानी पवित्र स्थान या स्थल या जगह, उपर दर्शायें यह सभी समाज और कुल के लोग गुजराती में इस मंदिर को 'माता नो मढ' एसा बोलते हैं, इसलिए गुजराती में मां आशापुरा मंदिर को 'माता नो मढ' एसे नाम से पहचाना जाता हैं।

दर्शन समय। Darshan Timing
सुबह में 5:00 बजे से लेकर रात को 9:00 बजे तक मंदिर खुला रहता हैं।
आरती समय। Aarti Timing
हर रोज सुबह में 5:00 बजे मंगला आरती होती हैं।
हर रोज सुबह 9:00 बजे सुबह की आरती होती हैं।
हर रोज शाम को 7:00 आरती बजे आरती होती हैं, लेकिन गरमी के दिनो और ठंड के दिनो में आरती के समय में बदलाव कीया जाता हैं।

मां आशापुरा मंदिर कैसे पहुचें। Ma Aashapura mandir Kaise pahuchen। How to reach Ma Aashapura mandir
हवाई मार्ग से : मां आशापुरा मंदिर से सबसे नजदिकी हवाई अड्डा भूज शहर का श्यामजी कृष्णा वर्मा एयरपोर्ट हैं, जो एक राष्ट्रिय हवाई अड्डा हैं। फिर आपको सडक मार्ग का उपयोग करना पडेगा।
रेल मार्ग से : सबसे नजदिकी रेलवे स्टेशन भूज रेलवे स्टेशन हैं, जहा गुजरात के बडे शहर अहमदाबाद, वडोदरा, सुरत, वलसाड से लेकर मुंबई के लिए ट्रेन उपलब्ध हैं। फिर आपको भूज से सडक मार्ग का उपयोग करना पडेगा।
सडक मार्ग से : मां आशापुरा मंदिर के लिए भूज ही नजदिकी बडा शहर है, जीसे आपको ध्यान में रखना हैं। भूज से फिर आप गुजरात सरकार की बस या प्राइवेट ट्रावेल की बस का उपयोग कर के माता नो मढ यानी मां आशापुरा मंदिर आप पहुच सकते हैं। आप टेक्षी सेवा या केब का भी उपयोग कर सकते हैं, भूज से माता नो मढ यानी मां आशापुरा मंदिर लगभग 95km स्थित हैं।
                     दोस्तो, यह थी आशापुरा माता मंदिर गुजरात के बारें में कुछ जानकारी, आशा रखता हु यह जानकारी आपको जरुर पसंद आयी होगी और साथ ही कामना करता हु आपकी यात्रा आनंदमय मंगलमय हो। आप जहा भी यात्रा करें वहा की सभ्यता-संस्कृति का आदर सम्मान जरुर करें, साफ-सफाई पर जरुर ध्यान दे, स्वच्छता का खयाल जरुर रखें। प्रकृति से आपका जुडाव और भी गहरा हो एसी प्रार्थना के साथ...
                     ।। जय माताजी, जय कुबेर ।।

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