अंबाजी यात्रा धाम जानकारी।अंबाजी के दर्शनीय स्थल।अंबाजी यात्रा धाम महत्व।अंबाजी मेला कब होता है?।Travel Teacher

                        अगर गुजरात के पर्यटन की बात की जाए तो गुजरात भारत का एक मात्र ऐसा राज्य है जहां अलग-अलग रुचियों के लोगों के मुताबिक घूमने की कई जगहें हैं। जो लोग प्रकृति प्रेमी हैं उन्हें यहां खूबसूरत साइट्स मिलेंगी वहीं आर्ट, वाइल्ड लाइफ पसंद करने वाले लोगों के लिए भी यह पर्फेक्ट जगह है। लेकिन गुजरात का धार्मिक महत्व इन सब से कई गुना ज्यादा है। गुजरात एक ऐसी जगह है जहां पर हिंदू धर्म से संबंधित कई धार्मिक स्थान हैं जो अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। दोस्तो,इस पोस्ट मे हम ऐसे ही एक गुजरात का अति भव्य मंदिर जो 51 शक्ति पीठो मे से एक है,आस्था का परम केन्द्र है और पर्यटन का बेहद ही आकर्षक स्थान हैं उसके बारे मे बात करेंगे। जहा जगत जननी माँ जगदम्बीका सदैव अपने भक्तो को आशीर्वाद देने के लिए बैठी है,और वो स्थान हैं अंबाजी
                        गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित अंबाजी मंदिर दुर्गा माता का प्रसिद्ध मंदिर है। श्वेत संगमरमर से निर्मित मां अंबाजी मंदिर गुजरात-राजस्थान सीमा के नजदीक स्थित है। माना जाता है कि यह मंदिर लगभग बारह सौ साल पुराना है। यह बेहद ही भव्य मंदिर का शिखर एक सौ तीन फुट ऊंचा है। अंबाजी मंदिर में आने वाले भक्त दिव्य लौकिक शक्ति की पूजा करते हैं, जो अंबाजी के रूप में अवतरित होती है। मंदिर देवी शक्ति के दिल का प्रतीक है और भारत में प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। यह स्थान पर मां सति का ह्य्रदय गिरा था। अंबाजी हिंदू तीर्थयात्रियों के लिए धार्मिक पर्यटन का एक प्रसिद्ध स्थान है। इस मंदिर में वैदिक काल से पूजा की जाती है और यह सर्वविदित है कि क्षेत्र के आसपास के लोग पवित्र भजन के रूप में अंबाजी का नाम लेते रहते हैं।अंबाजी मंदिर की यात्रा का सबसे अच्छा समय सर्दियों के दौरान अक्टूबर से मार्च के बीच होता है। इस समय यहां का मौसम अनुकूल होता है।
अंबाजी मंदिर का महत्व।Ambaji mandir ka mahatva
अम्बाजी मंदिर से जुड़ी रोचक कहानी यह है कि, इस जगह पर भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार हुआ था और भगवान राम भी शक्ति की उपासना के लिए यहां आ चुके हैं। पौराणिक कथा के अनुसार रामायण काल में, भगवान राम और लक्ष्मण रावण द्वारा सीता जी का अपहरण करने के बाद सीता की खोज में माउंट आबू के जंगल में भी आए थे। एक कथा के अनुसार,रानी रुक्मणीजी ने भगवान कृष्ण को अपना पति बनाने के लिए यहां देवी अंबाजी की पूजा की थी। कुंति पुत्र भीम ने 'अजयमाला' नामक एक माला जो युद्ध में विजय प्राप्त करवाती हैं वो भी पांडवो के वनवास के दौरान इसी स्थान से प्राप्त की थी।
अंबाजी भादो का मेला।Ambaji Bhado ka mela
इस मेले में पूर्णिमा की रात में एक पारंपरिक और लोकप्रिय लोक-नाटक भवई का प्रदर्शन किया जाता है। चाचर चौक में लोकगीत जैसे कार्यक्रम आयोजीत कीये जाते हैं। दुनिया भर से प्रत्येक वर्ष लगभग 15 से 20 लाख श्रद्धालु इस मेले में शामिल होते हैं। भादो मास की पूर्णिमा मां अंबाजी का प्रागट्य दिन है। अंबाजी में भादो महिने मे मेले के दौरान सबसे ज्यादा संख्या में लोग तीर्थयात्रा के लिए आते हैं और अपना समय प्रार्थना और भक्ति में बिताते हैं। तिर्थ यात्री आसपास के अन्य मंदिरों में जाते हैं,साथ ही सप्तशती के पाठ में भी शामिल होते हैं। स्थानीय दुकानों के अलावा, अस्थायी स्टॉलों में खाने-पीने की चिजे, खिलौने, चित्र और मूर्तियों की मूर्तियां, ताबीज, बांस के लेख,राजस्थानी हस्त कला की चीजे आदि की बिक्री की जाती है। इस मेले की रौनक और मनोरंजन यात्री को सालो तक याद रहने वाली होती है।

अंबाजी के दर्शनीय स्थल।Ambaji ke darshniy sthal।Places to see near Ambaji
गब्बर गढ।Gabbar Gadh
अंबाजी की असली बैठक गब्बर पहाड़ी के ऊपर हैं। मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर गब्बर नामक पहाड़ है।गब्बर पर्वत की चोटी पर देवी मां का एक छोटा सा मंदिर हैं।अंबाजी के दर्शन के बाद श्रद्धालु गब्बर पहाड़ पर जरूर जाते हैं। यहा पर पर्यटक केबल कार का लुफ्त अक्सर उठाते हैं,जीस का मझा ही कुछ अलग है।
भादरवी पूर्णिमा के दिन बड़ी संख्या में भक्त देवी की पूजा करने और मंदिर के बाहर आयोजित होने वाले अद्भुत मेले में भाग लेने के लिए यहां पहुंचते हैं। इस उत्सव पर पूरे अंबाजी कस्बे को दीपावली की तरह रोशनी से सजाया जाता  है। यहा नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्रि में यहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। इस समय मंदिर के प्रांगड़ में गरबा करके शक्ति की अराधना की जाती है। प्रत्येक माह पूर्णिमा और अष्टमी तिथि पर यहां मां की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
कामाक्षी मंदिर।Kamakshi Mandir
अंबाजी से मात्र 1 किमी दूर कामाक्षी मंदिर परिसर भारत की सभी 51 शक्तिपीठों का प्रदर्शन करता है।बेहद ही खुबसुरत और आकर्षक इस मंदिर मे जाने का मौका हर पर्यटक,भक्त गवाना नहि चाहता।
कैलाश पहाड़ी का सूर्यास्त।Kailash pahadi ka Suryast। Sunset of Kailash pahadi
कैलाश पहाड़ी अंबाजी से केवल किमी दूर एक पिकनिक और तीर्थ स्थान दोनो है यह। कैलाश टेकरी के ऊपर एक सुंदर शिवालय मौजूद है। पहाड़ी पर महादेव के मंदिर में एक शानदार कलात्मक पत्थर का गेट भी है।सुर्यास्त के समय जाना सबसे लुभावना समय होता है।अक्सर लोग यहा सुर्यास्त देखने के लिए जाते है।जिस का नजारा ही कुछ और है।
कुंभारिया जैन मंदिर।Kumbhariya Jain Mandir
यह जैन मंदिर से जुड़ा एक ऐतिहासिक स्थान है। यहा पर श्री नेमिनाथ भगवान का ऐतिहासिक जैन मंदिर है जो 13वीं शताब्दी का है।कुंभारिया अंबाजी मंदिर टाउन से डेढ़ किलोमीटर दूर है। कुम्भारिया, बनासकांठा जिले में सांस्कृतिक विरासत के साथ ऐतिहासिक, पुरातत्व और धार्मिक महत्व का एक गाँव है।
मानसरोवर।Mansarovar
पर्यटक और भक्त इस मानसरोवर में पवित्र स्नान करने के लिए आते हैं। जो मुख्य मंदिर के पीछे है। ऐसा कहा जाता है कि इसका निर्माण अहमदाबाद के अंबाजी के भक्त श्री तपिशंकर ने 1584 से 1594 तक किया था। इस पवित्र सरोवर के दो किनारों पर दो मंदिर हैं, एक महादेव का है और दूसरा अजय देवी का है, जिनके बारे में माना जाता है माता अंबाजी की बहन हैं। मंदिर ट्रस्ट ने नवीकरण परियोजनाओं को भी शुरू किया है।
                        दोस्तो,अंबाजी मंदिर एक मंदिर ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है। ट्रस्ट ने पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए लाइट एंड साउंड शो की व्यवस्था भी की है। मंदिर के अधिकांश हिस्सों जैसे निज मंदिर गर्भ गृह, द्वार शक्ति, आंगन शक्ति और अन्य क्षेत्रों में कलात्मक आवरण मौजूद हैं।अम्बाजी मंदिर की वास्तुकला बहुत ही कलात्मक और अद्भुत है, जो भारतीय संस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित करती है। अंबाजी का मुख्य मंदिर एक विशाल मण्डप और गर्भगृह में माताजी के पवित्र गोख से छोटा है। निज मंदिर मध्यम आकार का है और इसमें देवी की कोई मूर्ति या तस्वीर नहीं है। माना जाता है कि श्री आसुरी माता अम्बाजी गर्भगृह की दीवारों में एक छोटे से गोख में निवास करती हैं। इसलिए गुजरात के लोग गुजराती मे"चाचर ना चोक वाळी,गब्बर ना गोख वाळी मां अम्बा" कहते हैं।

अंबाजी मंदिर और आरती का समय।Ambaji mandir aur aarti ka samay।Ambaji Temple Opening And Aarti Timing :

गर्मियों के दीनो में :
सुबह 7 बजे से रात 9:15 तक मंदिर में दर्शन होते हैं।
बारिश के दिनों में : 
सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक मंदिर मे दर्शन होते है।
सर्दियों के दीनो में : 
सुबह 7 बजे से रात 8 बजे तक मंदिर मे दर्शन होते हैं।

मां की आरती हर सुबह 6 बजे होती  है। मध्याहन आरती दोपहर 12 बजे और संध्या आरती शाम 7 बजे से 7:30 बजे तक होती है।

अंबाजी कैसे पहुंचे।Ambaji Kaise pahuche।How To Reach Ambaji
आप यहां राजस्थान या गुजरात जिस भी रास्ते से चाहें पहुंच सकते हैं। यहां से सबसे नजदीक स्टेशन माउंटआबू का पड़ता है।
हवाई मार्ग से :
अंबाजी का निकटतम हवाई अड्डा अहमदाबाद का सरदार वल्लभाई पटेल अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट हैं।जहा से अंबाजी मंदिर की दूरी 186 किमी है।
सड़क मार्ग से :
गुजरात के सभी प्रमुख शहरों से दांता अंबाजी के लिए नियमित बस सेवा संचालित है। अहमदाबाद, वडोदरा, पालनपुर और गांधीनगर रोडवेज के माध्यम से कई निजी टैक्सी सेवाओं और सरकारी और निजी बसों के माध्यम से अच्छी तरह से अंबाजी पहुचा जा सकता हैं ।
रेल मार्ग से :
अंबाजी का प्रमुख निकटतम रेलवे स्टेशन आबू रोड है, जो लगभग 20 किमी की दूरी पर स्थित है। वहीं पालनपुर रेलवे स्टेशन यहां से करीब 40 किमी दूर है। अलग-अलग राज्यों के कुछ नजदीकी शहरों और अन्य शहरों से ट्रेनें आबू रोड से जुड़ी हुई हैं, जिनका उपयोग करके आप अंबाजी पहुच सकते हो।

दोस्तो,यह थी गुजरात के भव्य और प्राचिन मंदिर अंबाजी की कुछ जानकारी।आशा रखता हु यह जानकारी आपको पसंद आयी होगी।दोस्तो,आप जहा भी यात्रा करे स्वच्छता और पर्यावरण का खयाल जरुर रखे और वहा की सभ्यता-संस्कृति का आदर सम्मान भी जरुर करे।आपकी यात्रा आनंदमय,मंगलमय हो एसी कामना के साथ....
                        ।। जय माताजी,जय कुबेर ।।

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